बदल रहा है ज़माना बदल रहे है लोग।🔥

‘धर्म’ और ‘आस्था’ में फ़र्क़ क्या है? मुझे नहीं पता। गूगल से जानकारी जुटाने की कोशिश की तो सर्वज्ञानी अंकल ने टूटी – फूटी हिंदी में जो बताया वो सरासर निरर्थक था पर मस्तिष्क की ज़ोर आज़माइश पर समझ आया की ‘धर्म’ वो जो धारण किया जा सके और ‘आस्था’ धर्म को धारण करने का ज़रिया है।
ख़ैर, यह बेतुकी विवेचना मेरे गले तो नहीं उतरी पर इस प्रयास से एक बात साफ हो गई की

‘धर्म’ किसी ‘वल्कल’ का मोहताज नहीं,
कंठ में रुद्राक्ष की माला का एहसास नहीं।।
नग्न बदन तप से इच्छा ना होगी पूरी,
व्रत, त्याग, तपस्या का कोई काम नहीं।।

इसलिए अगर मोटरसाइकल पर ‘वल्कल’ धारण कर ‘धर्म’ की राह पर सरपट दौड़ा जाए तो कोई आँट नहीं।

अगर कुछ चाहिए तो सिर्फ़ ‘आस्था’ और यदि आपकी जीवन के अस्तित्व में ‘आस्था’ मज़बूत है तो फिर किसी ‘धर्म’ की आवश्यकता नहीं।
🙏🏽🙏🏽

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